Tuesday, 23 April 2013

खालिस्तान की खिचड़ी


खालिस्तान की खिचड़ी



पंजाब के पूर्व वित्तमंत्री रहे, डॉक्टर जगजीत सिंह चौहान 1971 से ही भारत में सिक्खों के ऊपर कथित अत्याचारों का खूब प्रचार करते थे। उन्हें राजनीति का अछूत समझा जाता था। इसलिए उन्होंने एक नया आंदोलन खड़ा करने की सोची। मगर डॉक्टर चौहान में करंट तभी आया, जब एक बार 1977 में वह पाकिस्तान घूम आए। इसी यात्रा में न जाने किस ताकत ने उन्हें यकीन दिला दिया कि वह ही स्वतंत्र खालिस्तान राष्ट्र के राष्ट्रपति होंगे ?

पाकिस्तान से वापसी के बाद, कुछ वक्त तक इधर-उधर सभाएं करते-करते डाक्टर चौहान ने अंततः स्वर्ण मंदिर को अपनी गतिविधियों का केंद्र बनाया। वहां उन्होंने 12 नवंबर 1979 को एक ट्रांसमीटर लगवाया तथा 2 मार्च 1980 से शब्द कीर्तनों का सीधा प्रसारण कराना शुरू कर दिया। मार्च 1980 को गुरूद्वारा केसगढ़ साहिब, आनन्पुर (रोपड़) में डॉक्टर चौहान ने एक केसरिया झंडा फहराया और कहा कि यह खालिस्तान का राष्ट्रध्वज है। कुछ दिन बाद डाक्टर चौहान की अध्यक्षता वाली नेशनल काउंसिल ऑफ खालिस्तान के महासचिव बलबीर सिंह संधु ने 16 जून, 1980 को स्वर्ण मंदिर में अकाल तख्त के सामने खालिस्तान सरकार की घोषणा की। कुछ और समय बाद खालिस्तान का पासपोर्ट व मुद्रा भी जारी की गई। इन्हीं हरकतों की बदौलत अप्रैल 1981 में भारतीय पासपोर्ट रद्द होने के बाद, इंग्लैंड में जा बसे डॉक्टर चौहान ने 18 मई, 1983 को एक बयान देकर पूरे विश्व को चौका दिया, ---- अमेरिका और पाकिस्तान-खालिस्तान आंदोलन को मदद दे रहे हैं। पाकिस्तानी जासूस सिखों के भेष में अमृतसर में गुरु रामदास सराय में ठहरे हुए हैं।

इसी दौरान पाकिस्तान ने पंजाब को छूने वाली सीमा पर 'पाकिस्तान जियोग्राफिकल सोसायटी' नामक एक संस्था को सक्रिय कर दिया। दिखावे को यह संस्था सीमावर्ती क्षेत्रों का सर्वेक्षण करती थी, मगर असल में पंजाब में गड़बड़ी फैलाने को सिख खाड़कुओं को भरती व प्रशिक्षण का बंदोबस्त करने में आइएसआइ की मदद करती थी। शुरुआत में अटक और लाहौर के किलों में खाड़कुओं को 15 दिनों का प्रशिक्षण दिलाया जाता था, जिसमें उन्हें हमला करने, गिरोह बनाने तथा विध्वंसक गतिविधियों का संचालन करना बताया जाता है।

पंजाब में बड़े पैमाने पर आतंकवादी हिंसा के बाद 6 जून, 1984 को ऑपरेशन ब्लू स्टार के जरिए तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी ने स्वर्ण मंदिर से खाड़कुओं को निकालने को सेना की मदद ली। इसके फौरन बाद डॉक्टर जगजीत सिंह चौहान ने बी०बी०सी० को दिए साक्षात्कार में कहा था, "........जल्दी ही प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उसके परिवार के सदस्यों की हत्या करा दी जाएगी।"
30 अक्टूबर, 1984 को श्रीमचि गांधी की दुखद हत्या के बाद भड़की हिंसा में निर्दोष सिखों पर जुनूनियों ने प्राणघातक हमले किए, तो शायद यह प्रक्रिया भी पाकिस्तान के पूर्वानुमान में शामिल थी। फिर दिल्ली, उत्तर प्रदेश और हरियाणा के विभिन्न शहरों में ट्रांजिस्टर बमों का सिलसिला चला, जिसमें करीब 150 लोग मारे गये। खुफिया एजेंसियों की जांच में इन हादसों के पीछे विदेशी साजिश का संकेत मिला।

अप्रैल 1986 में लोकसभा में आंतरिक सुरक्षा मंत्री अरुण नेहरू ने खुलेतौर पर कहा कि सरकार के पास अब पक्के सबूत है कि पाकिस्तान ही सिख खाड़कुओं को प्रशिक्षण दे रहा है। उन्होंने कहा कि हमारे पास लोगों के नाम, पते, प्रशिक्षण केंद्रों के स्थान तथा पाकिस्तानी मदद का पूरा ब्यौरा है। पिछले दस महीने में करीब ढ़ाई दर्जन खाड़कुओं के पकड़े जाने का खुलासा करते हुए श्री नेहरू ने कहा था कि गिरफ्तार लोगों ने पूछताछ बहुत-सी सनसनीखेज सूचनाएं उगली हैं।

इंटैलीजेंस ब्यूरों को जांच में पता चला था कि दुर्दांत अपराधी भी आतंकवाद की आड़ में तस्करी और हथियारों का कारोबार कर रहे हैं। फिर भी पाकिस्तान इन्हें सहायता दे रहा था। उन्हीं दिनों गिरफ्त में आया खाड़कू हरजिंदर सिंह जिंदा, एक बैंक डकैत था और अहमदाबाद जेल से फरार था। देवेंद्र सिंह भाई, को अनेक हत्याओं में शामिल माना जाता था। बख्शीश सिंह तथा उपकार सिंह नशीली दवाओं के तस्कर थे। इन अपराधियों से आतंकवादी नेता बने लोगों और उनके साथ पकड़े गये अन्य व्यक्तियों से पूछताछ में यह बात सही पायी गयी कि अमृतसर में स्वर्ण मंदिर में ही सबसे पहले लोगों का सम्पर्क भर्ती करने वालों से होता था। यह काम कुछ दूसरे गुरुद्वारों में भी हो रहा था।

पूछताछ में पता चला कि खाड़कुओं को अनेक सीमांत गावों से पाकिस्तान में चुपचाप दाखिल कराया जा रहा था। सीमा पार करते ही उन्हें सीमा पुलिस के लोग, जिन्हे रेंजर कहते हैं, मिलते थे और कुछ खातिरदारी के बाद आइएसआइ के एजेंटों के पास, शहरी क्षेत्र में स्थित एक मकान में भेज देते थे। जहां से इन लोगों को सेना का ट्रक फैसलाबाद जेल ले जाता था। जेल में ही इन लोगों को बताया जाता था कि खालिस्तान बनाने का सपना अगर पूरा करना है तो भारत सरकार के खिलाफ लड़ना तथा हिंदुओं को कत्ल करना पड़ेगा। साथ ही दूसरे सिख - 'विद्वानों' के भाषण भी इन्हें सुनवाए जाते थे। इन विद्वानों में भिंडरा वाले के भतीजे भाई जसबीर सिंह, बलबीर सिंह संधु तथा बब्बर खालसा मुखिया सुखदेव प्रमुख थे।

फैसलाबाद जेल में सैद्धांतिक प्रशिक्षण पूरा होने के बाद इन लोगों को लाहौर, रावलपिंडी और उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत में बने प्रशिक्षण शिविरों में सैनिक कार्रवाइयों की तालीम दी जाती थी। शुरू में .38 और .455 रिवाल्वरों से निशानेबाजी सिखाई जाती थी। फिर बड़े हथियारों को चलाना और सभी तरह के विस्फोटकों से काम लेना बताते थे। प्रशिक्षण में घरेलू सामान से बम बनाना, पुल उड़ाना, हथकड़ियां खोलना तथा हथियारों की छिटपुट खराबी ठीक करना भी सिखाते थे। इसके बाद पाकिस्तानी सेना की मदद से ये लोग सीमा पार कर के वापस पंजाब में घुस जाते थे।

बाद में प्रशिक्षित खाड़कुओं को किसी भी कार्रवाई का आदेश 'ऊपर' से मिलता था। जैसे अमुक की हत्या कर दो। अमुक समय आयोजित बैठक में निर्देश प्राप्त करके कार्यवाही में भाग लो।

एक खाड़कुए सरबजीत सिंह ने तो यहां तक कहा कि पाकिस्तान में खाड़कुओं को सरकार ने मकान दे रखे हैं। इनमें अतिंदर पाल सिंह, गुरजीत सिंह, सुखदेव सिंह और बलबीर सिंह तो लाहौर में रह रहे हैं और भाई कंवर सिंह को सियालकोट में मकान मिला है। उसने यह भी बताया कि कोट लखपत जेल (लाहौर) में भी खाड़कुओं को सैद्धांतिक शिक्षा देने के बाद हथियारों का प्रशिक्षण दिया जाता है। एक वक्त मे कुल1500 से 2000 लोगों को शिविरों में प्रशिक्षण तथा हथियार आदि दिए जाते हैं। भारत में वारदात कर के भागने वाले खाड़कू भी इन्हीं शिविरों में शरण पाते थे।

1988 में ऑपरेशन ब्लैक थंडर के दौरान पकड़े गए खाड़कुओं ने बताया कि आइएसआइ अफसरों ने उन्हें हुक्म दिया था कि शिव सेना प्रमुख बाल ठाकरे की हत्या कर दें। खाड़कू चंचल सिंह उधोके ने बताया कि आइएसआइ के लोग ही तय करते है कि किसकी हत्या करनी है। उधोके के कमांडर लेफ्टीनेंट जनरल सुखदेव सिंह झमके को भी 'ऊपर' से पाकिस्तानी खुफिया अफसर ही निर्देश देते थे। फिर अपने किसी साथी को, झमके हथियार वगैरा देकर 'काम' करने भेज देते थे। इन खाड़कुओं को नहीं मालूम था कि दूसरों की मौत के वारंट और आदेश जारी करने वाले लोग कौन थे ? मगर सभी को यकीन कराया गया था कि जब पाकिस्तान की मदद से खालिस्तान बनेगा, तो सब खाड़कुओं (सिख योद्धाओं) को ऊंचे ओहदे मिलेंगे।

पंजाब पुलिस द्वारा मार्च 1994 के पहले सप्ताह में पकड़े गये आइएसआइ एजेंट ऐयाज महमूद के अनुसार, आइएसआइ मौके की तलाश में है और पंजाब में लोगों को फिर से खालिस्तान लेने को उकसाने का वक्त आते ही अपनी कार्रवाइयां तेज कर देगी। फिलहाल हम आपकी कमियों पर निगाह रख रहे हैं ......